रेल्वे स्टेशन और दौड़ती ट्रेनों में अवैध हॉकर्स का बोलबाला…

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लाइसेंसधारियों की आड़ में बेपरवाह हॉकर्स का साम्राज्य; घटिया खाना, मनमाने दाम; यात्रियों की सेहत पर संकट

पूर्णा १५ सप्टेंबर (प्रतिनिधि) – दौड़ती ट्रेनों और  पूर्णा स्टेशन पर अवैध हॉकर्स का दबदबा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है और यात्रियों की खुली लूट जारी है। स्थानीय स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई न होने से ये हॉकर्स और भी बेखौफ हो गए हैं। यात्रियों से मनमाने दाम वसूलना, बदतमीजी करना, दबंगई दिखाना जैसी घटनाएँ आम हो चुकी हैं, जिससे यात्रियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। रेलवे प्रशासन इन हॉकर्स की करतूतों पर आँख मूँद कर क्यों बैठा है? और यात्रियों की सुरक्षा का सवाल आखिर कब सुलझेगा? यही प्रश्न यात्री उठा रहे हैं|

लाइसेंसधारियों की मिलीभगत में ‘दलाली’. पूर्णा स्टेशन पर 3 कैंटीन, 2 टी-स्टॉल और इनसे जुड़े 25 अधिकृत वेंडर हैं। मगर इनके अलावा सैकड़ों अवैध हॉकर्स सुबह से लेकर देर रात तक ट्रेनों और प्लेटफॉर्म पर घूमते रहते हैं। खास बात यह है कि यात्रियों का आरोप है कि ये हॉकर्स सीधे-सीधे स्थानीय प्रशासन और लाइसेंसधारी कैंटीन वालों की मिलीभगत से काम कर रहे हैं। रेलवे प्रशासन के कुछ अफसरों की ‘मूक सहमति’ के बिना इतना बड़ा धंधा संभव ही नहीं, ऐसी चर्चाएँ आम हैं।

घटिया व बासी खाना, स्वास्थ्य पर खतरा पानी की बोतलें, वडा-पाव, कोल्ड ड्रिंक्स, समोसा, कचौरी, भेल, पॉपकॉर्न से लेकर बाहर से पका कर लाई गई खिचड़ी तक नियमों के खिलाफ बेची जाती हैं। इनमें से ज़्यादातर सामान खुला रहता है और स्वच्छता व सुरक्षा मानकों की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। 10 से 15 रुपये की पानी की बोतल 20 रुपये में बेची जाती है। यात्रियों की सेहत को खतरा पहुँचाने वाले ये खाद्यपदार्थ रोज़ हज़ारों की संख्या में बिकते हैं। यहाँ तक कि अधिकृत वेंडर भी कोई मास्क ,हॅन्डग्लोज,को तुझं नहीं कर रहे है! साथी साथ घटिया और बासी खाना परोसते हैं।

नांदेड़–परभणी–हिंगोली क्षेत्र में 150 हॉकर्स इस इलाके में तकरीबन 100 से 150 अवैध हॉकर्स सक्रिय हैं। ये लोग पानी की बोतलें और खाद्यसामग्री ऊँचे दामों पर बेचते हैं। यात्रियों से बहस करना, ऊँची आवाज़ में चिल्लाना, धमकाना जैसी घटनाएँ दिनदहाड़े होती हैं, जिससे यात्रियों को मानसिक यातना झेलनी पड़ती है।

रेलवे सुरक्षा बल की ‘टार्गेट तक’ कार्रवाई? रेलवे सुरक्षा बल (RPF) कभी-कभार कार्रवाई कर मुकदमे दर्ज करता है। मगर यह केवल ‘टार्गेट पूरा करने’ तक ही सीमित रहती है। कार्रवाई के बाद कुछ दिनों तक हालात काबू में आते हैं, फिर स्थिति जस की तस हो जाती है। कुछ महीने पहले ही यहाँ के RPF इंस्पेक्टर का तबादला हुआ था, लेकिन नए अफसर से भी कोई सुधार नज़र नहीं आ रहा।

बिना लाइसेंस वाले ‘सेल्समैन’

दौड़ती ट्रेनों और स्टेशन पर नीली शर्ट पहने पुरुष, महिलाएँ, यहाँ तक कि बच्चे भी बिना लाइसेंस खुलेआम खाने-पीने का सामान बेचते दिखते हैं। इससे लाइसेंसधारक वेंडर, कैंटीन चालक और प्रशासन की मिलीभगत साफ झलकती है।

वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका क्या? पूर्णा स्टेशन से रोज़ 40 से 50 एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनें गुजरती हैं और इस मार्ग पर यात्रियों की भारी आवाजाही रहती है। ऐसे में अवैध हॉकर्स का बढ़ता दबदबा यात्रियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर गंभीर संकट है। स्थानिक रेल्वे के रेल सुरक्षा बल स्वच्छता निरीक्षक के साथ ही वरिष्ठ अधिकारी लापरवाही दिखाऊ रहे है|कोई कारवाई नहीं की जा रही है| अब देखना यह है कि रेलवे प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी इस पर क्या रुख अपनाते हैं, क्या कोई ठोस कदम उठाते हैं या फिर स्थिति जस की तस बनी रहती है।

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